धन्वन्तरि वाटिका ( आयुर्वेदीय औषधि पौधों की वाटिका)

 Dhanvantari Vaatika



  आयुर्वेदिक औषधियों की गुणवत्ता किसी से छिपी नहीं है। शैशवकाल से लेकर वृद्धावस्था तक हम इन औषधियों का अपने जीवन में किसी न किसी रूप में सदियों से प्रयोग करते आये हैं परन्तु आज हमारी परम्परागत घरेलू चिकित्सा विधियाँ अब लुप्त होती जा रही हैं। वनस्पतियों के औषधीय गुण के ज्ञान को लोग भूलते जा रहें हैं ऐसे में औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण-संवर्धन की चेतना लुप्त हो रही है और हाल के तीन-चार दशकों में  लकड़ी, शोभा तथा छाया की दृष्टि से ही वृक्षारोपण कर रहे हैं और हम सब के आस-पास से अनेकानेक औषधीय पेड़-पौधे लुप्त हो गये हैं और उनके स्थान पर बाहर से लाये पेड़-पौधों की बहुतायत हो गयी है जिनका हमारे स्वास्थ्य पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है इसके मूल्यांकन की आवश्यकता समीचीन हो गयी है।
 
स्पष्ट है कि हमारे आस-पास के पेड़-पौधे हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं अतः हमें संदिग्ध औषधि प्रभाव वाले पेड़-पौधों को अपने आवासीय परिसर एवं उसके समीप में लगाने से बचना चाहिए तथा श्रेष्ठ औषधीय गुणों या अपने लिए औषधीय दृष्टि से वाँछित पेड़-पौधों का अधिकाधिक रोपण करना चाहिए। अतैव जरूरत है कि इस प्राकृतिक सम्पदा को अपनाने की जो सर्वसुलभ हैं व निरापद हैं।

इन आयुर्वेदिक औषधि पौधों के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए तथा आवश्यकता पड़ने पर उनसे ताजी औषधि प्राप्त करने की सुगमता ही राजभवन, उ0प्र0 में धन्वन्तरि वाटिका की स्थापना की अवधारणा का मूल है। धन्वन्तरि वाटिका की स्थापना राजभवन उ0प्र0 में आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धन्वन्तरि के नाम पर तत्कालीन राज्यपाल श्री विष्णुकान्त शास्त्री जी की प्रेरणा से 24 फरवरी, 2001 को हुई ।

हरित अभियान के अन्तर्गत एवं अन्य अवसरों पर माननीय श्री राज्यपाल, प्रमुख सचिव श्री राज्यपाल तथा राजभवन के अन्य अधिकारियों द्वारा समय-समय पर अनेकों औषधीय पौधे रोपित किये जाते हैं। इस वाटिका में 250 से अधिक प्रजातियों के पौधे उपलब्ध हैं जिसमें अनेक दुर्लभ औषधि पौधे यथा रुद्राक्ष , कल्पवृक्ष, सिन्दूरी , कृष्णवट, सीता अशोक आदि भी सम्मिलित हैं ।